Saturday, December 17, 2011

कहानियाँ जो पढ़-पढ़ के रोया

बहुत साल पहले एक किताब खरीदी थी लखनऊ में - 'बचपन में याद रही कहानियाँ'। कुछ नामी लेखकों ने बात की थी उसमें अपने बचपन में याद रही कहानी के बारे में। जब भी सोचता हूँ अपनी "बचपन में याद रही" कहानियोँ के बारे में, वही चंद नाम हैं जो बाँध लेते हैं हर बार। मज़े की बात ये है कि इनमें से हर कहानी जितनी बार पढ़ी है, हर बार रोया हूँ - कभी चुपचाप, कभी फूट-फूट कर। एक फ़ेहरिस्त:

एक बारह बरस का लड़का अमृतसर के एक बाज़ार में एक आठ बरस की लड़की से पूछता है - तेरी कुड़माई हो गयी? और वो कहती है 'धत्'। और फिर एक दिन वो 'धत्' नहीं कहती।
पच्चीस साल बाद, लहना सिंह लाम में शहीद हो जाता है अपनी 'सूबेदारनी' के लिये।
आज फिर ये कहानी पढ़ी और फिर रोया। पता नहीं क्यों और किसके लिये। सूबेदारनी - वो तो जा चुकी हज़ारा सिंह के पास! और लहना - वो तो मैं कभी हो ही नहीं पाया।
ये थी चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी' की  "उसने कहा था"!

दूसरी एक कहानी है शिवानी की - लाल हवेली। ताहिरा वापस आई है पाकिस्तान से अपने बचपन के शहर किसी शादी में। जहाँ वो रुकी है, वहाँ उसे खिड़की खोलते ही लाल हवेली दिखती है और उसके सामने सुधा जाती है। सुधा, जो वो कभी खुद थी, मुल्क तकसीम होने और 1947 के दंगे से पहले। वकील साहब, जिन्होंने सुधा की गुमशुदगी के बाद कभी शादी नहीं की, सुधा जो सालों से ताहिरा बन चुकी है, और बिल्वेश्वर महादेव!

कुछ और भी कहानियाँ हैं, जिन्होंने सारी सोच और अस्तित्व को झिंझोड़कर रख दिया और तब भी बार-बार पढ़ने से रुक नहीं पाया मन -

डंगर बोली - मुहम्मद मंशा याद
बंटवारा - गुलज़ार
कज़ाकी - प्रेमचंद
सिकन्दर हार गया - अमृतलाल नागर
ओ हरामज़ादे - भीष्म साहनी

जल्द ही लिखूँगा अपने पसंदीदा उपन्यासों और व्यंग्य लेखों पर भी। वैसे, उपरोक्त में से कुछ कहानियाँ मेरे पास हैं जो मेल की जा सकें। अगर चाहिये तो हो तो यहाँ अपना ई-मेल लिख देना।


3 comments:

varun yadav said...

varunyadavkosli@gmail.com
Sir if u culd send me all those which u r having with u.....

Priti said...

pritirima@gmail.com

Malvika said...

malvika.chhatwani@gmail.com

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