Monday, January 11, 2021

The cursed lover

I was a soldier once. I fought with valor and fought tirelessly. 

And I always won. I always won because there was a small fish of life within me. 

A fish of life, a fish of love, a fish with big eyes of luster and longing.

I traveled across the oceans and traveled across the mountains, I searched in the cities and searched in the skies, and everywhere I asked...


And when I couldn't find that fish of life and that fish of love, 
I couldn't even live. I couldn't even die.

And then, from nowhere, one fine day, one fine moment, a fish swam to me.

A fish of life, a fish of love.

The fish swam with me, the fish swam in me. 

I held her close. I lived for the fish. 

I loved her more, each day.

I lied for her. I ran for her. 

Heck, I even changed my plan for her.



And then, as I always feared,

And then, as I always knew,

Because I know I am a cursed lover, 

And then, it happened...

And here I am... 
Again, alone, as always!
Every time, I know, when I fall in love,
there comes a giant wave,
For I know, I am 
*The cursed lover*

Saturday, December 12, 2020

क्या मेरी फ़स्ल हो चुकी? क्या मेरे दिन गुज़र गए?

बहुत पहले, एक बार किसी दोस्त में कहा था कि वो हैंडराइटिंग एक्सपर्ट है। ग्राफोलॉजिस्ट। मेरी हैंडराइटिंग पढ़ते हुए उसने कहा था कि मैं किस परिस्थिति में क्या कर जाऊंगा, ये शायद मैं खुद भी नहीं जानता। उस समय मैं हँस दिया था। दोस्त तो मेरे साथ नहीं रहा, दोस्त की बात रह गयी।

Steve Jobs once said, you can connect the dots only backwards. Well, hindsight is 20/20. 

अक्सर दोस्त कहते थे, अपने बारे में भी कोई शेर कहने को। कभी जब मन और जीवन जोश में हुआ करता था, हम उद्ध्रत करते थे दुष्यन्त कुमार को -
हमने तमाम उम्र अकेले सफ़र किया,
हम पर किसी ख़ुदा की इनायत नहीं रही।

ख़ैर, तब उम्र देखी ही कितनी थी जब ऐसी लन्तरानियाँ करते थे। उम्र के साथ जब खुद को थोड़ा सा पहचाना, अली सरदार ज़ाफ़री का शेर हमारा परिचय बन गया था -
हमसे बढ़कर ज़िन्दगी को कौन कर सकता है प्यार
और अगर मरने पे आ जाएं तो मर जाते हैं हम।

ऐसे बहुत काम किये, बहुत दिन ऐसे गुज़ारे कि ज़िन्दगी को प्यार किया और फिर एक दिन, एकदम से, मर भी गए। उम्र का एक तीसरा दौर देख रहे हैं अब। किसी किसी दिन लगता है कि बहुत कुछ करना है - कॉलम लिखने हैं, पेपर्स बाकी हैं, यूट्यूब चैनल और क्वोरा और कविता क्लब और नेचर वॉक्स और .....। बच्चन के शब्दों में - 
शेष अभी है मुझमें जीवन, दुनिया अब क्या मुझे छलेगी
चार कदम उठकर मरने पर, मेरी लाश चलेगी।

और फिर, बहुत जल्द ही लगने लगता है कि ऐसा भी क्यूँ ही करना। जीवन में अंतिम प्रेम को भी खोकर, मृत मन का बोझ लेकर, और खुद से खुद को तौलते - परखते - नकारते हुए जिये जाने से भी क्या होगा? गौतम की तरह पलायन भी नहीं कर पाते और घर बैठे बुद्ध होने की त्रासदी जी रहे हैं। अब हम मन से थक चुके हैं और जीवन हमसे थक चुका है। आख़िरश: पता है कि केवल जॉन एलिया का ही शेर काम आने वाला है -
क्या ये जनम हुआ तमाम?
हाँ ये जनम हुआ तमाम!
क्या मेरे दर्द गुज़र गए?
...
नहीं दोस्त, दर्द तो अभी और गुज़रने हैं कई। 

Friday, November 13, 2020

Kitte Koi Ronda Hovega? !!

When I was young and naive, I thought that my life and experiences are so unique. But then, when I became old and naive, I understood that everything that I have lived through has been lived through and even written about by others. I found nearly all my experiences in some parts of the literature or the other. I think, in this blog only, I wrote some posts about that feeling. 

However, as it was bound to happen, I grew up to become older and naive... And that is why, a few days ago, I realized it yet again. That my life is not only lived and written through literature. It is all around me. Sample this - can you imagine someone listening to some popular Punjabi pop songs and finding bits and pieces of their own life, dreams, and nostalgia in that? Serious pieces! Sounds ridiculous, right? Well, c'est la vie

And if at this point you think that I am going to tell you those songs and resemblance I found... you are right! Or, on second thoughts, let it be! Baat niklegi to phir door talak jaayegi... Or as someone sang in a Punjabi song: Sadde Palle Vi Jo Rone Geya Pa... Kitte Koi Ronda Hovega!! 


Saturday, October 10, 2020

जिस झोली में सौ छेद हुए ...

एक न एक दिन तो ऐसा होना ही था। लेकिन इतनी जल्दी होगा ये नहीं सोचा था। या फिर हमेशा की तरह, सोचना नहीं चाहा था कभी। लेकिन हर शै की तरह तुमको भी एक दिन खोना ही था। 

इस कैम्पस से कुछ समय से मन भर सा गया है। और मन भरपूर होकर नहीं भरा। एक दो जगह थीं, जहाँ जाकर मन पूर जाता था। थोड़ा सा escape, थोड़ा सा जीवन, थोड़ी सी शान्ति। 


उसी में से एक जगह कल फिर गया था। सामने दीवार बनते देखी। जल्द ही उतना दिखाव भी बंद हो जाएगा जो कल देखा। शायद 3 महीने, या छः। एक न एक दिन तो ऐसा होना ही था। लेकिन इतनी जल्दी होगा ये नहीं सोचा था। या फिर हमेशा की तरह, सोचना नहीं चाहा था कभी। लेकिन हर शै की तरह तुमको भी एक दिन खोना ही था। 

इंशा जी उठो अब कूच करो
इस शहर में जी का लगाना क्या
दीवानों की सी न बात करे
तो और करे दीवाना क्या !!

Friday, September 18, 2020

मिल जाये अपना सा पागल...

ऐसे ही कुछ सोचते, कुछ बिना सोचे दो दिन पहले कुछ लिखा। फिर वो लिखा हुआ मन में गूंजता रहा। वो कुछ यूँ था कि : 

बात अगर करने को हमको
मिल जाये अपना सा पागल,
तो फिर क्या दिन रात महीने 
जन्मों घूमें जंगल जंगल।

फिर जब वो कुछ मन में कुछ ज़्यादा ही गूंजता रहा तो कुछ और भी सोचना पड़ा। 
वैसे, कुछ लोग मिलते रहे हैं ऐसे भी जीवन में, जो पूरे नहीं पर थोड़े बहुत तो थे अपने जैसे ही। लेकिन अगर सच में पूरा अपने जैसा कोई बात करने को मिल गया तो क्या होगा? बहुत समय तक तो शायद कुछ भी नहीं... ना खुलने की आदत, खुलने का डर, और खुल जाने पर भी और पचासों सोच के धागे! 

और फिर क्या बात करेंगे अपने जैसे पागल से??!!
शायद कुछ रोना-धोना, कुछ उदास अधूरी मुहब्बतें, कुछ बचकाने से सपने, कुछ अशआर, कुछ अरमान... और शायद और भी बहुत कुछ। सह पाएंगे क्या अपने जैसे non-sequitur, arbitrary बकवास करने वाले को? ये आलोचन, ये छिद्रान्वेषण, ये नैराश्य, ये आत्मश्लाघा, ये आत्म-सन्देह - खुद जैसे को सहन करना तो खुद को सहन करने से भी मुश्किल लगता है।

शायद जो लिखा, वो वैसा नहीं लिखना था। जो नहीं लिखा, वैसा लिखना था। 
 
बात अगर करने को हमको
मिल जाये अपना सा पागल,
तो फिर क्या जन्मों का किस्सा
इक दिन में हो रहेगा दंगल। 

Friday, July 31, 2020

सुना है Sid साहब महफिलों की जान होते थे...

मेरा पूरा ब्लॉग तो तुमने पढ़ा है, पता नहीं कितनी ही बार। तो तुमको भी लगता होगा न कि पता नहीं कितनी उदास अधूरी कहानियों से गुज़र कर हम यहाँ तक पहुंचे हैं।  अगर लगता है तो ऐसा गलत भी नहीं होगा शायद।

लेकिन उन उदास अधूरी कहानियों में कभी-कभार कुछ अच्छे मोड़ भी रहे हैं। और उन अच्छे दिनों में, उन अच्छे मोड़ों पर मन उतना उदास नहीं हुआ करता था। उन दिनों के रंग भी अलग होते थे, सपने भी, और संगीत भी। और जब उदास दिनों पर इतना कुछ लिखा है और अधूरेपन के गानों की एक छोटी सी सूची भी बना दी थी ( यहाँ ) तो फिर कुछ प्रसन्न मन गाने भी क्यों न याद कर लिए जाएँ ! 

अब ये मत पूछना कि ये गाने कब, किस दौर में, और किसके लिए हैं।  हमेशा की तरह मेरा जवाब वही होगा - एक उदास मुस्कान !!!


सावन बरसे तरसे दिल - दहक (लिंक)
इक मुहब्बत का दीवाना 
ढूंढता सा फिरे 
कोई चाहत का नज़राना 
दिलरुबा के लिए 


ये खोया खोया रहता है - डोली सजा के रखना (लिंक
वो सुब्ह का तारा है 
हाँ वो किस्मत से हमारा है


तुम्हे हो न हो - घरौंदा (लिंक)
मगर मैंने ये राज़ अब तक न जाना 
कि क्यों प्यारी लगती हैं बातें तुम्हारी 
मैं क्यों तुमसे मिलने का ढूँढूँ बहाना 
कभी मैंने चाहा तुम्हे छू के देखूं 
कभी मैंने चाहा तुम्हे पास लाना 

फिर भी जो तुम दूर रहते हो मुझसे 
तो रहते हैं दिल पे उदासी के साये 


उफ़्फ़ तेरी अदा - कार्तिक कॉलिंग कार्तिक (लिंक
देख के भी नहीं हो यकीं


ओ मेरे दिल के चैन - मेरे जीवन साथी (लिंक

यूँ तो अकेला भी अक्सर 
गिर के सम्हल सकता हूँ मैं 
तुम जो पकड़ लो हाथ मेरा 
दुनिया बदल सकता हूँ मैं 
माँगा है तुम्हें दुनिया के लिए 
अब खुद ही सनम फैसला कीजिये 


और एक ये भी: 
ओमारो पोरानो जहा चाय - रवीन्द्र संगीत (लिंक

तूमि छाड़ा आर ए जोगोते  
मोर केहो नाइ किछु नाइ गो


तूमि शुखो जोदि नहीं पायो 
जाओ शूखेरो शोंधाने जाओ 
एमी तोमारे पेयेछी हृदोयो माझे
आरो किछु नाही चाई गो


आमी तोमारे विरोहे रोहिबो बिलीनो 
तोमितो कोरीबो बाश 
दीर्घो दीबोशो दीर्घो रोजोनि 
दीर्घो बोरोशो माश 


और भी बहुत से गाने हैं, बहुत सारे ... लेकिन अब वो सब और ये सब भी शायद अगली बार सुनाऊंगा... अगली बार माने अगले जनम में !

Sunday, July 26, 2020

The tiny pleasures of intelligent interactions

So I finished my first fully-online course last week. It was a tiresome experience to talk to the screen in an empty classroom. The only solace was that nobody fell asleep in my view. I was apprehensive if the online mode of delivery is going to be a disaster or just a disappointment. However, multiple mails of appreciation after the last session were reassuring that I did okay and the class somewhat liked it. Maybe that, or they are too naive. And then, I had another thought-provoking interaction with a young and bright mind over Whatsapp. Just copying that message from a student and my reply here for posterity, with no editing other than some typos.


From the student, a single long message: 

I came across something really cool and it'd be great if you could share your views from an economic and public policy point of view. So from what I came across, the reason for inequality in society is that wealth distribution follows a Boltzman Distribution, which makes the upper tail very long and drawn out, and the lower tail very crunched up. Which effectively explains the increasing economic inequality in society.

Furthermore, even if a society starts off from a paradigm of equality (a flat line), it inadvertently shifts toward a paradigm of inequality and the Boltzmann curve begins to form. A prominent case in point is Israel. (one implication of this is that inequality is inherent in nature - from a Darwinian approach it already is).

Now here's where my mind gets blown, the reason for the Boltzman curve is that the money multiplication paradigm works differently for rich people and non-rich people. Rich people have access to financial instruments that allow their wealth to increase exponentially (for example stocks, derivatives, real estate etc), but the non-rich depend on just their wages/salaries which are largely immobile.

So, my question is, does making the stock market more accessible to the poor (coupled with imparting financial knowledge to the poor) solve the problem of inequality to a certain extent at least in theory?


From me, 4 long messages (I give such long replies so that people don't bother asking more). 

Boltzmann distribution works very well in physics. However, in economics, there are several caveats. Before that, one correction - increasing economic inequality in society is a grand leftist myth. What has actually happened is that from everyone at a very poor or sustenance level, everyone has become better off. Some faster than others but overall poverty has drastically fallen. Even the so-called poorest of the poor are far better off. For more nuances on that, you may want to read Hans Rosling's Factfullness.

Next, Boltzmann empirical correctness:
So in income distribution, it works well in moderate or middle-class income generation societies. However, in the very low (like sub-Saharan Africa) and very high-income societies, this may not hold. Something else, generically called power law, holds true for both ends of the society.

Coming back to moderate-income or middle-income societies, Boltzmann may hold. That is why, some middle-class people fall off the cliff and some become richer, based on the investment decisions (not only financial but also social, intellectual, networking, and time investments).

Now, the last bit of your observations -
1. Rich people have access to financial instruments that allow their wealth to increase exponentially (for example stocks, derivatives, real estate, etc), Not entirely true. The rates of return and the underwriting of the risk are often huge and while we may quote a few success stories, the failure stories are way more numerous. So how do they become or remain rich? Because the social network, knowledge, and institutional support that the rich can garner is far superior to what "poor" people can  (good moment to think how your IIM degree throws you in a superior league suddenly and that is why it is coveted)

2. but the non-rich depend on just their wages/salaries which are largely immobile - again, partially true. A more correct reason is that they rarely ever generate any significant surplus to invest. They also fail to invest in knowledge and networks (or invest but the quality is poor). Think of poor, semi-literate, small-town people or people who spent their surplus in Lovely University. That decides a perpetuating of low returns.

Finally, your question-cum-solution:

my question is, does making the stock market more accessible to the poor (coupled with imparting financial knowledge to the poor) solve the problem of inequality to a certain extent at least in theory?

No. For several reasons, like lack of surplus funds, poor risk appetite (I can afford a 10% loss on my 30 lakh portfolio but they can't take 10% of their 3 lakh portfolio). Also, knowledge is less about how to invest and more about where to invest and at what time, how to compare returns, and how to time-value the money. Most people (poor as well as rich) fail in that.

Then what can be the solution? - Ask the right question!

If the question is income inequality, there needs not to be a solution at all. Some people ought to be rich, some poor, some middle class, and that is totally fine as long as everyone is law-abiding and ethical.

If the question is basic dignified existence for everyone, rich and poor alike, then the solution is possible but not easy. The solution is two-fold -

At the individual level - people, as well as government, shall facilitate income-oriented education and skill-building. Basic healthcare and health insurance should be universally available. Safety and security (law and order + disease-free) is jointly promoted by society.

At the systemic level - if you see closely, our systems fail the poor and keep them powerless. Like inefficient and over-burdened police, extremely entitled and inefficient judiciary, unlawful activities protected by the slumlords, mafia, politicians, and police alike, and many more, like poor public policymakers (keeping education and health in pathetic shape), and so on. Solution - Institutional modernization, meritocracy, and emphasis on performance matrices. If you want to read more, this falls under institutional economics. You may start with Why Nations Fail by Daron Acemoglu and James Robinson or with Ruchir Sharma's Breakout nations.


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