Tuesday, July 18, 2017

Siddharthus The Narcissus incohatus

About 8 years ago, in the days of plenty of time, when  life had a different meaning, and Facebook was a novelty, I had made a quiz on Facebook and then wrote a post about it too (find it here). After ages, last year, someone asked me on Quora about things which most people won't know about me. I wrote a few points there but the list kept going on inside my head. So, sharing the Quora points first and some more here:

Assuming that my life is worth knowing, here are some things that I can share:

  1. I am really scared of the “unknown” (ghosts, paranormal, scary faces). My imagination is so fertile that I don’t even watch trailer of horror movies - not even the bad - sad scary movie, walking dead, or Ramsay brothers movies.
  2. I am really technology neutral. Despite owning and using all of the following, I don’t like talking / buying / searching / thinking / surfing about mobiles, computers, cars, and similar gadgets. Essentially, gadgets don’t excite me at all.
  3. I am hyper-organized. Reason - I am always scared of missing on something important. So all my mails are read and clearly labelled. My table, chairs in office, furniture at home, doormats, cutlery, kitchen, bedroom, soaps…. are always set in a particular way. All my books are sorted by type and almirahs have shelf-wise indices. All my clothes (including handkerchieves, socks, and shorts) are sorted by types, age, occasions, colors, and patterns.
  4. I like to take really good care of my skin and hair. On a daily basis, I use about 3–6 types of bodycare - haircare products.
  5. I love making lists - work to do, favorite things, favorite people, superpowers I want, people I would kill happily, and so on.
  6. I have learnt (mostly on my own and hopefully, reached a decent level of achievements once in a while with) languages, poetry, photography, ornithology, snake-catching, history, kite-flying, comics, mythology, psychology, astrology, massages, body-language, palmistry, reading, writing, publishing, consulting, and also, economics.
  7. There are many many many more items but I know that the secret of being a bore is to say everything. (And yet, I am now, going to say a lot more - still not everything though).
  8. I hate dogs and cats and lizards and mosquitoes and houseflies. Although I like birds, some animals, butterflies, snakes; I like all of them from a distance and do not like to touch an of them. 
  9. Animals have their genitals, stomach, heart, and brain at the same level, while humans have their genitals the lowest, stomach next, heart above that, and mind above all. I believe that is for a reason. I also believe that most people do not graduate beyond the lowest two levels of existence. I really look down upon people who are food obsessed and "live to eat" or talk a lot about food. I really despise such people, conversations, and thoughts.
  10. And while we are on food topic, I like bitter things - high dark chocolate, bitter gourd (karela), and black coffee. Still, I would not obsess to find opportunities for such conspicuous consumption.
  11. I think memory is a place, which one should visit inside the head only and not physically. When one visits those old people, friends, places, streets, schools and so on... they have moved on and so has one's own self. Seeing the past getting transformed and so different and mostly for worse is really heart-breaking.
  12. I believe in a supreme powerful God, who is an embodiment of the energy of the universe. I believe in astrology. I believe that the energy of the universe, the energy of planets and celestial bodies, and the energy of our thoughts, surroundings, and people affect us for good or for bad.
  13. Long back I read a long quote - I man should be able to fight a battle, change a diaper, balance accounts, write a poem... and that specialisation is for insects. I think I have always lived by that. While I have nothing against specialisation, I don't want to let go of all the fun things and explorations and experiments the life offers.
  14. I like listening to different languages' songs. I have playlists for Sanskrit, Bengali, Marathi, Tamil, Punjabi, dialects of Hindi (Awadhi, urdu, Bhojpuri, Haryanvi, Brij etc.) few European languages including English and French, and many more.
  15. I think most people are plain stupid, that free speech is overrated, and that I would happily get rid of most people I know.
  16. I over-analyze, over-plan, over-evaluate things, actions, people, plans, places... I am also very self-critical and live with constant judgmental gaze (and guilt) on myself. 
  17. I have spent days reading quotes, anecdotes, memes, and comic strips. I always did and still do - far less in frequency now but well!
  18. I really like teaching and I really like writing. But somehow, I don't feel enthused for either anymore. I have abandoned teaching as much as I could and writing has abandoned me for now.
  19. Now I want to write so many more things but I won't. What I really want is a quality conversation. I like talking to interesting people - who have done a lot of different things and whom I can listen to for long... and people, who can listen to me for long.

Friday, June 30, 2017

मह्वे-यास

मेरी ज़िन्दगी का हर साल एक ख़ास एहसास और एक ख़ास तर्ज का साल रहा है। बहुत पुरानी तो याद नहीं लेकिन सन १९९१ पतंगबाज़ी का था - दिन, रात, खाते, सोते, पतंग और डोर के नशे का। सन १९९६ था साल खेलने का - क्रिकेट, फुटबॉल, बैडमिंटन, दौड़, शतरंज, स्क्रैबल, चाइनीज़ चेकर - जो भी मिले, जैसे भी मिले, और जितना भी मिले। सन १९९७ था शायरी पढ़ने का। और दीवानावार हो कर घोटा था बशीर बद्र और मिर्ज़ा ग़ालिब को। पढ़ा औरों को भी लेकिन इतनी गहराई और तासीर इन्हीं दो शायरों ने दी।

उम्र के साथ दौर बदले और सन १९९९ रहा साल मुहब्बत का। मतलब न कुछ किया न कुछ हुआ लेकिन साल की शुरुआत की थी देवदास पढ़कर और फिर पूरा साल, देवदास की पारो की दीवानगी में।  खैर, पारो (माने EMMA) को न कभी खबर होनी थी न हुई। और फिर वही हुआ जो उस उम्र की मुहब्बत के बाद होता है - माने सन २००० था लिखने का दौर।  कविताएं, छंद, ग़ज़ल, नज़्म, और कुछ फुटकर कहानियाँ भी। लिखने का वो दौर ऐसा था कि कागज़-कलम जेब में या सिरहाने रहता था।  कभी सड़क किनारे रुक कर कुछ लिख लिया, कभी रात को जग कर, कभी पढ़ाई के बीच में, कभी खाते वक़्त बाएं हाथ से।

वक़्त की एक करवट और आयी जल्द ही। सन २००१ में पापा के साथ व्यापार में गहरे उतरने का भी साल रहा और व्यापार से मोह-भंग का भी। इस मोह-भंग ने सन २००२ की भी दिशा बदल दी। स्नातक ख़त्म करके आगे पढ़ने और सीखने का साल रहा सन २००२।  सन २००४ था साल अपने अंतर्द्वंद में उलझने और अपने को समझने का।  उसी साल में बहुत कुछ नया पढ़ना सीखा जिससे आगे की  दिशा ही बदल गयी। और अगर सन २००४ की उलझन ना होती तो शायद सन २००५ की सफलता भी ना होती।

सन २००५ में आईआईएम अहमदाबाद जाना जीवन की दिशा और दशा निर्धारित कर गया और कई साल शायद कुछ सोचने का वक़्त ही नहीं मिला। सन २००८ और २०१५ थे घूमने और दुनिया  देखने के साल। सन  २०१० और २०१४ थे पदोन्नति के साल - कभी नयी जगहों पर पहुँचने के तो कभी नए रिश्तों तक पहुँचने के साल। सन २०१३ था झटकों का साल और साल ये समझने का कि एडमिनिस्ट्रेशन और पावर-पॉलिटिक्स मेरे बस का नहीं। इतना छल - छद्म और राजनीति झेलने की इच्छा भी नहीं रही कभी।

और अंतत:, सन २०१७ ! ये साल आधा गुज़र चुका है आज तक। और आगे भी ऐसा ही रहेगा, ये तय लगता है। तो ये साल रहेगा नाउम्मीदिओं का साल, मन ऊबने का साल, और अपने में सिमट जाने का साल।  पढ़ाने से मन उचट चुका है, लिखने से दिमाग़ नाउम्मीद कर चुका है, लोगों से बात करने से लेकर घर से बाहर निकलने तक, बस खुद को घसीटते फिर रहे हैं किसी तरह। और अब आगे आने वाले सालों से बस यही एक आस है कि हमको अपने आप में सिमट जाने दें।

कोई मिला तो हाथ मिलाया, कहीं गए तो बातें कीं।  
घर से बाहर जब भी निकले, दिन भर बोझ उठाया है।  

Saturday, April 22, 2017

क्या कहूँ आज जो नहीं कही...

आज एक नए दोस्त ने टोका बहुत कम लिखने को लेकर... इस मैसेज के साथ -


2007-2011 average posts= 40,
2012-2016=15
2017 4 months gone = 1

सांख्यिकी सही हो या गलत, पता नहीं, बात तो सही ही थी। पता नहीं अब लिखना कम क्यों हो गया है। काम बहुत करने लगे हों, ऐसा तो नहीं है। लिखने का मन भी शायद बहुत करता है। विचार भी, ऊल -जुलूल ही सही, कम नहीं होते। उस नए दोस्त ने कहा कि प्रोफेसर बनने के बाद लिखना, खुलना, कहना मुश्किल होता हो शायद। शायद, होता होगा।
फिर सोचा।
ऐसा होने के कुछ कारण समझ आये... कई ध्यान ही नहीं आये.. कुछ कुछ समझ नहीं आये... कुछ समझना नहीं चाहे। जो भी समझा या जो भी नहीं समझा , वो कहना बिलकुल भी नहीं चाहा !

ऐ नए दोस्त मैं समझूँगा तुझे भी अपना 
पहले माज़ी का कोई ज़ख्म तो भर जाने दे।

Thursday, March 9, 2017

बुझ चुकी उम्मीदों का शहर

लखनऊ... लखनऊ .... लखनऊ... लखनऊ .... लखनऊ... लखनऊ ....

पहले इस नाम में कैसी लज़्ज़त हुआ करती थी... एक आकर्षण, एक पुकार, एक हूक, एक नॉस्टाल्जिया, एक  रौशनी, एक उम्मीद... कभी इस शहर के लिए ग़ज़लें लिखी थी हमने और कभी इसी शहर में न आ पाने के ग़म में वनवास जैसी नज़्में लिखी थी.

और अब... चौथा दिन शहर में... एक शाम बंद दरवाजों में बैठ कर गुज़री, दूसरी लैपटॉप पर. तीसरी घर पर, और चौथी ? पता नहीं लेकिन ये पता है कि अब ये शहर अपनी बाहें नहीं फैलाता... यहां पर बहुत सारी पुरानी यादें तो हैं... टहलने निकलो तो एक किस्म की पुकार - ये रास्ता तो फलां की वजह से याद है, इस सड़क पर तो उसका घर था, ये रेस्टॉरेन्ट की वो टेबल पर तो उसके साथ बैठे थे, और इस पेड़ के नीचे तो फलां के साथ भीगे थे...

लेकिन ये सब यादें लखनऊ को एक बोझिल जगह बनाती जा रही हैं. पहले यहां यादों के साथ उम्मीदें भी थीं - उम्मीदें नयी यादें बनाने की, नए दोस्तों के साथ नये रास्तों पर भटकने की, नए दिनों की खुशबूओं को साथ में पकड़ने की... अब ये शहर केवल मर चुकी यादों और बुझ चुकी उम्मीदों का शहर रह गया है.

और असल हादिसा ये है कि जब एक शहर से उम्मीदें बुझी तो ऐसा नहीं है कि कोई नयी शमआ जल गयी हो। सो इसी नाउम्मीदी के बीच, लखनऊ के एक होटल में बैठे हमारे साथ जगजीत सिंह साहब मिर्ज़ा ग़ालिब को गा रहे हैं :
ज़ुल्मतक़दे में मेरे शबे-ग़म का जोश है
एक शमअ है दलील-सहर सो खमोश है. 

Friday, October 14, 2016

कुछ Facebook से


इधर काफी सारी लिखाई फेसबुक पर होने लगी है... कई चीज़ें हैं, जो सोची तो लिखी नहीं या लिखी तो फेसबुक के अनुकूल लगी. लेकिन वो तो कुछ दिन में उड़नछू हो जाने वाला माध्यम है. सो जब तक स्मरण साथ दे, सोचा क्यों न ऐसी कुछ लेखनी अपने फेसबुक से अपने ब्लॉग पर संजो ली जाए!

September 8, 2016: wrote this while teaching at AIT, Thailand

Today morning, I told my students (from different countries including Thailand, Pakistan, Afghanistan, Myanmar, China, India, Nepal, Bangladesh...) that Indian culture is very music and celebration oriented and that is one of the many things that connect all of us!
Personally, 15 days back, it was loads of Krishna-vandana in Hindi, Awadhi, and Brij. Last week, I was listening to Marathi Zingat and Sanskrit archana of Ganesha. Two days ago, I was finding Benagli songs and discovering fresh facets of romantic poetry with Nilanjana, Ruby Roy, Bela Bose, and the classic Ami Chini go Chini. Today, I've been galloping in Punjabi songs from Shiv Kumar Batalvi and Hans Raj Hans to recent ones like Yaar Anmulle, Roohafza, and Kharku...
So many languages, so many varieties, so many shades of celebrations... You know why I love India? Because there is so much to love!!

March 23, 2016: Wrote this on the Martyrdom anniversary of Bhagat Singh, Sukhdev, and Rajguru (English version below)

२३ मार्च १९३१ - भगत सिंह, राजगुरु, और सुखदेव का बलिदान दिवस. देश के लिए जान देना बड़ी बात है. लेकिन वो तो कितने ही और क्रांतिकारियों ने भी किया था. तो इन तीनों ने ऐसा क्या ख़ास काम किया कि अलग से याद रखा जाए? मतलब चंद्रशेखर आज़ाद, मदनलाल ढींगरा, वासुदेव बलवंत फड़के, रोशन सिंह, अशफ़ाक़ुल्ला खान, लाला हरदयाल, लाला लाजपत राय, और भी जाने कितने शहीद हुए. तो फिर भगत सिंह, राजगुरु, और सुखदेव ही ख़ास क्यों?
क्योंकि इन तीनों की शहादत ने वो किया जिसके बिना आज़ादी मिलना तो क्या आज़ादी की मांग उठना भी नहीं होता. १९२९-३० तक कांग्रेस की मांग केवल इतनी ही होती थी कि ब्रिटिश राज के अधीन भारत को स्वायत्तता अर्थात आंशिक आज़ादी या डोमिनियन स्टेटस भर दे दिया जाए. मतलब इतने साल से कांग्रेस केवल अंग्रेज़ों के अधीन रहते हुए अपनी स्थानीय सरकार बनाने और ब्रिटिश राज का भाग बने रहने के लिए ही लड़ रही थी. लेकिन भगत सिंह, राजगुरु, और सुखदेव के बलिदान ने उस चिंगारी का काम किया कि स्वायत्तता का नारा पूर्ण स्वराज में बदलने को विवश हुआ. पहली बार देश में अंग्रेज़ों को बाहर निकालने की बात शुरू हुई. भगत सिंह सही थे. अगर गांधी उन्हें बचा लेते तो भगत सिंह का काम शायद अधूरा रह जाता. भगत सिंह, राजगुरु, और सुखदेव - उनका बलिदान ही उनकी सफलता थी.

23 March 1931 - the martyrdom day of Bhagat Singh, Rajguru, and Sukhdev. It is a really big deal and great honor to give away one's life for the motherland. But didn't so many others did it too? I mean, why are Bhagat Singh, Rajguru, and Sukhdev more special than, let's say - ChandraShekhar Aazaad, Madan Lal Dhingra, Raushan Singh, Rajinder Lahiri, Ashfaqulla Khan, Binoy-Badal-Dinesh, Lala Hardayal, and Lala Lajpat Rai?
Because the martyrdom of Bhagat Singh, Rajguru, and Sukhdev achieved something that eventually made the independence possible. Till 1930, Congress as the flagbearer of independence movement was demanding only a dominion status within the British raj. It means Congress only demanded local governance and representation while happily accepting British as the natural masters. But the fire that Bhagat Singh, Rajguru, and Sukhdev ignited with their sacrifice of life forced Congress to abandon the demand of self-governance and replace it with full independence. For the first time, Indians wanted to throw British out of our land. Bhagat Singh was right. Had Gandhi agreed to save his life, which Irwin was willing to grant by commuting his death sentence to a life imprisonment, then, Bhagat Singh's ultimate sacrifice would have been incomplete. Bhagat Singh, Rajguru, and Sukhdev - their sacrifice was their success!

January 24, 2016: After watching the movie 'Airlift' (English version below):

एयरलिफ्ट देखिये. अगस्त १९९० में किसकी सरकार थी याद करिये. विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार और विदेश मंत्री थे इन्द्र कुमार गुजराल. महीनों तक बढ़ते तनाव के बावजूद कोई तैयारी नहीं की गयी थी. १ लाख ७० हज़ार को बचाया ज़रूर लेकिन कुवैत जाकर नहीं, १ हज़ार किलोमीटर दूर ओमान बुलाकर. दो महीने तक एयरलिफ्ट करना पड़ा. अगर एक क्लर्क ना जूझा होता तो गुजराल साहब सद्दाम हुसैन से गले ही मिलते रहते बस (इतिहास पढ़िए - खाड़ी युद्ध के दौरान हमलावर सद्दाम से गले मिले थे गुजराल और अमरीका को कोसा था - क्यों?!!).

इसके बाद याद करिये १९७२ में भारतीयों को ९० दिन की चेतावनी देने वाले ईदी अमीन के दिन. उन ९० दिनों के दौरान युगांडा को चेतावनी देने वाली इंदिरा सरकार सिवाय एक तिनका न हिला पायी. बस अपने कूटनीतिक रिश्ते तोड़ लिए और युगांडा में बसे भारतीयों का निकलना और दूभर कर दिया. अपने दम पर कुछ ४-५ हज़ार भारतीय भारत पहुंचे और हज़ारों अन्य दुसरे देशों की शरण में जाने को मजबूर हुए.

इसके बाद याद करिये २०१५ का यमन में चला ऑपरेशन राहत. २७ मार्च को हमला हुआ और चौथे दिन से "राहत" शुरू. ११ अप्रैल को ऑपरेशन पूर्ण. इस हमले के महीनों पहले से ही भारत सरकार चेतावनी दिए जा रही थी. वीसा देने में कमी कर दी थी. गैर-ज़रूरी स्टाफ को निकाल लिया था. इसको कहते हैं सरकार. अब याद रखियेगा कि अप्रैल २०१५ में किसकी सरकार थी.

Go watch Airlift. Can you recall whose government was that in August 1990? PM VP Singh and Foreign Minister IK Gujral. There were warnings and signs of tensions and problems but all the great government of India did was to hug Saddam Hussain, the aggressor - and got no concessions in return. (Read History - IK Gujral did that at the height of aggression). 1.70 lakh Indians were evacuated but not in Kuwait. They had to travel a 1000 kilometers across borders to reach Oman. The operation lasted for 2 months and had a clerk not fought his way through, IK Gujral would have happily got those thousands Indians killed.
Go back a little more and recall August 1972 - Idi Amin, the mad dictator of Uganda, warned Indians to leave his country within 90 days. The Iron Lady - Indira Gandhi - warned him against aggression and Idi Amin couldn't care less. Sadly, Indira's warnings worked in India only. We severed our diplomatic relations suddenly, making escape even more miserable for those thousands of Indians.
Now, recall Operation Raahat - Yemen, April 2015. The aggression started on March 27, 2015 and government of India started the evacuation on April 1st. The operation was complete on 11 April, 2015. Before you jump on numerical comparisons, GoI was issuing warnings much in advance, had slowed down visa issues, and had taken the non-essential staff off-duty. This is what is called the governance and the government!
Now don't you forget whose government was there in April 2015!!

Saturday, September 3, 2016

फ़ुर्सत के पल

कभी जब फ़ुर्सत हो, मतलब एकदम फ़ुर्सत ... ऐसी फ़ुर्सत कि काम तो चाहे जितने हों, मन पर बिल्कुल न छाये हों... तो ऎसी फ़ुर्सत में मन क्या करेगा?

ऐसी ही फ़ुर्सत है इधर कुछ दिन से. भारत से बाहर निकल कर कुछ ऐसा ही हाल होता है. तकरीबन दो महीने थाईलैण्ड में गुज़ारने हैं पढ़ाने के लिए. हफ़्ते में एक या दो क्लासेज़ होती हैं और बाकी रोज़ पहाड़ सी फ़ुर्सत।

सो ऐसी फ़ुर्सत में मन क्या करेगा? पुराने ब्लॉग पढ़े, एक कविता लिखी, भीष्म साहनी की कहानियाँ पढ़ीं, कैमरा लेकर एक लम्बी दूरी तक टहले भरी धूप में, भूपिन्दर की ग़ज़लें या हरि ओम शरण के भजन सुने और अथाह सोचा.

बहुत कुछ सोचने के बीच ये भी सोचा कि कोई देश अच्छा या बुरा, अपना या पराया कैसे लगता है. भाषा? जब दक्षिण भारत में घूम रहे थे तब भी भाषा अलग थी लेकिन अपनत्व तो कभी कम नहीं लगा. मौसम? यहाँ थाईलैण्ड का मौसम इन्दौर जैसा ख़ूबसूरत नहीं लेकिन शायद कलकत्ता या मुम्बई जैसा तो है ही - उमस और तीखी धूप से भरा. पेड़-पौधे या जीव-जन्तु? यहाँ भी वही मैना, कबूतर, गौरैया, अमलतास, बादाम, और गुलमुहर हैं जो वहाँ होते हैं और दक्षिण भारत या मिज़ोरम या गोआ में तो विभिन्नता इससे कहीं ज़्यादा थी. मुद्रा? शायद. लेकिन अमेरिका या दुबई की मुद्रा भी तो अलग थी. वो इतने पराये क्यों नहीं लगे?

खैर, हमें क्या पता! क्योंकि हमारे लिए भारत में सब अपना सा लगता रहा और देश के बाहर सब पराया. ये फ़ुर्सत भी अपनी नहीं, परायी है. तभी तो इस फ़ुर्सत से कुछ अच्छा नहीं, सिर्फ़ ये अनर्गल प्रलाप ही निकला. 

Monday, July 11, 2016

आज की लिखाई

बारिश के दिन बड़े उदासी लगते हैं 
ताज़े पत्ते सारे बासी लगते हैं 

बारिश और हम-तुम भीगें स्कूटर पर 
शीशे कार के सत्यानासी लगते हैं 

गलियों में बारिश कीचड़ जो असली थे 
दसवीं मंज़िल से आभासी लगते हैं 

अंदर बाहर सब पानी हो जाता है
सारे जन पानी के वासी लगते हैं 

पोखर भरते एक छलावा हैं लेकिन 
कुछ दिन को तो बारामासी लगते हैं 

व्यस्त परिंदे, उगते अंकुर, हँसते बच्चे  
तुम बिन मुझको सब उपहासी लगते हैं

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