Wednesday, September 18, 2013

SHaPE of India

Just finished teaching the second frequency of the course - SHaPE (Social, Historical, and Political Economy) of India. This was for undergrad students and pretty soon, I'd start a variation of the same course for doctoral students. The basic idea emanated from wide-spread ignorance and misinformation about Indian history, polity, and economy. The focus is, although, India and Indian economic development particularly post 1947 and post 1991 reforms, we have discussed things as varied as Yom Kippur, Sun Yat Sen, Lohia, Sikhs, Marathas, Hijarat, Ambedkar, Marx, Daahir, World Wars, Mongols, Incas, Brettonwoods and what not...

It was heartening to see great response from the undergrads as well as from doctoral students. Interestingly, this year, the post-graduate (MBA) students have also demanded the same. I hope for an equally wonderful experience with their class as well. meanwhile, here is some more information on the course - one may use the same for academic and any other non-commercial purposes, with due acknowledgement of course!

Course Modules
Module 1: History - A historical look at the economics, politics, and society of India
Module 2: Economics – A select sectoral and industry level analysis of Indian economy
Module 3: Socio-Political – Analysis of social and political issues from an economic perspective

We started with the very basic argument - as a business management student, why should one study history? That too social or political history! We also spent some time of how to read history and why Indian history is not linear but more complicated than most other civilizations. Then, we took a cursory look at the ancient and medieval era, British era, and the struggle for independence. Thereafter, we talked for most portion of the course about the interaction of economics and politics during 1947 to 1990, including our foreign relations, development experience, and the underlying ideological / philosophical underpinnings of the economic policy framework. Finally, we analyzed reforms in some detail and also took a leap of faith in predicting / posing future scenarios for India - social, political and economic as well.

The analysis perspective has been driven more by approach, philosophy, and impact-assessment; whereas, facts and figures remain a fringe motivator and guide to the discussion. It was expected that by the end of the course, the participants are aware of evolution eras of India’s social, political, and economic structures and are able to provide an informed commentary on relevant topics. The students made life miserable for me by asking reading too much and asking too much... as a result, I had to study even harder. But at the end, I am glad that all of us were left more informed and more curious to understand the SHaPE of India. 

Sunday, September 15, 2013

Poetic Geniuses - 6

Find earlier posts on Poetic Geniuses Here and Here.

Circa 1997, I was in class 10th, when I started pursuing Hindi-Urdu poetry actively as an enthusiast. I was lucky to chance upon two books at that time, which made me understand the depths of poetry in great detail.

Second book was "दीवान-ए-ग़ालिब" by Ali Sardar Jaafri, which had meanings of difficult Urdu words as well as contextual explanations, wherever required. That helped me in understanding Urdu and setting the technical details for future years of writing.

The first book, although did not bestow any great technical skill like the second one, was more influential, for it made me fall in love with the sheer joy of Urdu poetry. The book was "ujaale apni yaadon ke" (उजाले अपनी यादों के) by Bashir Badr. Here is quoting some select verses from him... as always, this is just indicative and many great gems may remain hidden. If you want more pearls, take a dive yourself  :)

चाँद ने रात मुझको जगा कर कहा
एक लड़की तुम्हारा पता ले गई

***

मुख़ालिफ़त से मेरी शख़्सियत सँवरती है
मैं दुश्मनों का बड़ा एहतराम करता हूँ

***

वही ताज है वही तख़्त है वही ज़हर है वही जाम है
ये वही ख़ुदा की ज़मीन है ये वही बुतों का निज़ाम है

बड़े शौक़ से मेरा घर जला कोई आँच न तुझपे आयेगी
ये ज़ुबाँ किसी ने ख़रीद ली ये क़लम किसी का ग़ुलाम है

मैं ये मानता हूँ मेरे दिये तेरी आँधियोँ ने बुझा दिये
मगर इक जुगनू हवाओं में अभी रौशनी का इमाम है

***

अजीब शख़्स है नाराज़ होके हंसता है
मैं चाहता हूँ ख़फ़ा हो तो वो ख़फ़ा ही लगे

***

मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती ना मिला
अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी ना मिला

घरों पे नाम थे, नामों के साथ ओहदे थे
बहुत तलाश किया कोई आदमी ना मिला

तमाम रिश्तों को मैं घर पे छोड आया था
फिर इसके बाद मुझे कोई अजनबी ना मिला

बहुत अजीब है ये कुरबतों की दूरी भी
वो मेरे साथ रहा और मुझे कभी ना मिला

खुदा की इतनी बड़ी कायनात में मैंने
बस एक शख्स को मांगा मुझे वही ना मिला

***

मेरी शोहरत सियासत से महफ़ूज़ है
ये तवायफ़ भी इस्मत बचा ले गई

***

वो बड़ा रहीम-ओ-करीम है मुझे ये सिफ़त भी अता करे
तुझे भूलने की दुआ करूँ तो दुआ में मेरी असर न हो

मेरे बाज़ुओं में थकी-थकी, अभी महव-ए-ख़्वाब है चांदनी
न उठे सितारों की पालकी, अभी आहटों का गुज़र न हो

***

आस होगी न आसरा होगा
आने वाले दिनों में क्या होगा

मैं तुझे भूल जाऊँगा इक दिन
वक़्त सब कुछ बदल चुका होगा

***

मुझसे बिछड़ के ख़ुश रहते हो
मेरी तरह तुम भी झूठे हो

तुम तन्हा दुनिया से लड़ोगे
बच्चों सी बातें करते हो

***

दुश्मनों की तरह उस से लड़ते रहे
अपनी चाहत भी कितनी निराली रही

***

मेरे साथ तुम भी दुआ करो यूँ किसी के हक़ में बुरा न हो
कहीं और हो न ये हादसा कोई रास्ते में जुदा न हो

वो फ़रिश्ते आप ही ढूँढिये कहानियों की किताब में
जो बुरा कहें न बुरा सुने कोई शख़्स उन से ख़फ़ा न हो

***

मैं ख़ुद भी एहतियातन, उस गली से कम गुजरता हूँ
कोई मासूम क्यों मेरे लिए, बदनाम हो जाए

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में, ज़िंदगी की शाम हो जाए

***

इतनी मिलती है मेरी गज़लों से सूरत तेरी 
लोग तुझ को मेरा महबूब समझते होंगे । 
***

वो ज़ाफ़रानी पुलोवर उसी का हिस्सा है 
कोई जो दूसरा पहने तो दूसरा ही लगे । 

***
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में 
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलानें में। 

***
पलकें भी चमक जाती हैं सोते में हमारी, 
आँखों को अभी ख्वाब छुपाने नहीं आते ।

***

सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा । 
इतना मत चाहो उसे, वो बेवफ़ा हो जाएगा ।

हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है, 
जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे, रास्ता हो जाएगा । 

कितना सच्चाई से, मुझसे ज़िंदगी ने कह दिया, 
तू नहीं मेरा तो कोई, दूसरा हो जाएगा । 

मैं ख़ुदा का नाम लेकर, पी रहा हूँ दोस्तो, 
ज़हर भी इसमें अगर होगा, दवा हो जाएगा । 

सब उसी के हैं, हवा, ख़ुश्बू, ज़मीनो-आस्माँ, 
मैं जहाँ भी जाऊँगा, उसको पता हो जाएगा ।

रूठ जाना तो मोहब्बत की अलामत है मगर.
क्या खबर थी मुझसे वो इतना खफा हो जायेगा.
***

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